हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

देश के कानून छत्तीसगढ मे लागू नही

Written by Reyaz-ul-haque on 11/29/2009 05:00:00 AM

हमने सुना कि गृहमंत्री चिदंबरम छत्तीसगढ़ में जनसुनवाई करने जा रहे हैं. वैसे इस राज्य को जनसुनवाइयों का खूब अनुभव है. यहाँ जिस तरह की जनसुनवाइयां होती रही हैं, हाशिया पर उनके बारे में पहले भी लिखा जा चुका है. ‘जन चेतना’ ऐनवायरमेंट सपोर्ट ग्रुप के सदस्य रमेश अग्रवाल द्वारा कुछ जनसुनवाइयों की तफसील यहाँ दी जा रही है. हम उम्मीद करने की कोशिश करते हैं कि राज्य में इतिहास दोहराया नहीं जायेगा. 

जम्मू कश्मीर की तर्ज पर कई कानून राज्य में प्रभावित नही है। छत्तीसगढ पर्यावरण संरक्षण मंडल की कार्यप्रणाली से तो ऐसा ही लगता है कि पर्यावरण संबंधी कानून राज्य पर लागू नही होते। प्रदूषण नियंत्रण व पर्यावरण की बेहतरी के लिये भारत सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई है जिसे ई.आई.ए. अधिसूचना 2006 के नाम से जाना जाता है।

इस अधिसूचना की शुरूवात ही इन शब्दों से होती है कि कोई भी उद्योग राज्य अथवा केन्द्र सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना स्थापना संबंधी कोई कार्य नही करेगा। सबसे पहले सरकार के निर्देशानुसार उद्योग के लगने वाले क्षेत्र की व्यापक पर्यावरण अध्ययन रिपोर्ट तैयार करनी होती है। इसके बाद जन सुनवाई होती है और अंत में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय मंजूरी देता है। ( कुच्छ श्रेणी विशेष के उद्योगो के लिये  राज्य सरकार मंजूरी दे सकती है।)

लेकिन छत्तीसगढ राज्य में केन्द्र सरकारी की मंजूरी तो बाद की बात है, बल्कि जन सुनवाई के बहुत पहले ही उद्योगो का अधिकाशं काम पूरा हो चुका होता है। महावीर कोल बेनिफिकेशन का रायगढ की घरघोडा तससील के भेंगारी गांव में पावर प्लांट जन सुनवाई के पहले ही स्थापित हो चुका था। ऐसा नही है कि पर्यावरण विभाग को इसकी जानकारी नही थी। अगस्त 2007 में बिना पर्यावरणीय स्वीकृति निर्माण कार्य जारी रखने पर कंपनी को नोटिस भेज काम तत्काल बंद करने का निर्देश दिया गया। नोटिस पर अमल  हुआ भी या नही, यह जानने की कोई कोशिश पर्यावरण विभाग ने नही की। जन सुनवाई की घोषणा होने के बाद हमने पाया कि पावर प्लांट का काम लगभग पूर्णता की ओर था और अभी भी काम चल ही रहा था। स्थिति की तमाम जानकारी मय सबूत आला अधिकारियों को भेज कर जन सुनवाई रद्द करने की मांग की गई। चुंकि हफ्ते भर बाद ही जन सुनवाई होनी थी और इस बात पर हंगामा खडा हो सकता था, सो आनन फानन में प्लांट का निरीक्षण कर जन सुनवाई के मात्र तीन दिन पहले 28 जुलाई को कंपनी के विरूद्ध कोर्ट में केस प्रस्तुत कर नियमो की खाना पूर्ति कर ली गई। पहले ही विभाग द्वारा किये गये दो सालों से लंबित 22-23 केसों में एक और मामले की बढोतरी कर पर्यावरण विभाग ने अपना पल्ला झाड लिया।  तमाम वैध आपत्तियों और जन आक्रोश को दर किनार कर  संगीनो के साए में 31 जुलाई को जन सुनवाई की औपचारिकता पूरी कर ली गई।

दिनांक 4 अगस्त को एस.ई.सी.एल की छाल कोयला खदान के लिये और  9 अगस्त को जिंदल के सिमेंट प्लांट के लिये भी तमाम नियमों को दरकिनार कर जन सुनवाई पूरी कर ली गई।

कोयला खदान की जन सुनवाई में तो लोगों का आक्रोश चरम सीमा पर था। आम ग्रामीणों की बात तो अलग क्षेत्र के सरपंच तक को जन सुनवाई के बारे में मालूम नही था। आक्रोशित ग्राम वासियों ने एक स्वर में जन सुनवाई कैंसिल करने की मांग करते हुए जन सुनवाई का बहिष्कार कर दिया। लेकिन जिद्द पर अडे अधिकारियों ने पुलिस के बल पर जन सुनवाई की खानापूर्ति कर ही ली।

जिंदल की जनसुनवाई में तो पूरा धनागर गांव ही पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। ऐसी सुरक्षा व्यवस्था तो शायद खतरनाक आतंकवादियो की कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी नही होती होगी। जन सुनवाई तो कानूनन अवैध थी ही। एक और दिलचस्प नजारा यहां देखने को मिला। लोगों को हुक लगाकर बिजली लेना अपराध है की समझाईस देने वाले अधिकारी स्वयं तार में हुक फंसाकर पंडाल में पंखे चला रहे थे। यहां भी लोगो ने जन सुनवाई को नियम विरूद्ध साबित करने में कोई कसर नही छोडी। अधिसूचना का हवाला दिया गया। लेकिन जन सुनवाई का नाटक हर हालत में पूरा करने की कसमें खा कर ही मंच पर बैठने  वाले अधिकारियो पर न कोई असर होना था और न हुआ।

हाल में तीन और जन सुनवाईयों का ऐलान कर दिया गया है। इंड सिनर्जी व एम.एस.पी. स्टील एण्ड पावर लिमिटेड के स्टील व पावर प्लांट के विस्तार के लिए और सिंघल एंटरप्राईजेस के नये स्टील व पावर प्लांट लगाने के लिये। न तो पूर्व में हुई जन सुनवाईयां करवाने का अधिकार छत्तीसगढ बोर्ड  व जिला प्रशासन को था और न इन तीन घोषित जन सुनवाईयां करवाने का।

नियमत: उद्योग द्वारा जन सुनवाई करवाने के लिये जिस दिन आवेदन दिया जाता है उसके सात दिनों की तय सीमा में जन सुनवाई का स्थान व दिनांक घोषित कर समाचार पत्रों में सूचना प्रकाशित हो जानी चाहिये और 45 दिनों के भीतर जन सुनवाई हो जानी चाहिये।

अधिसूचना में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि 45 दिनों की तय सीमा में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जन सुनवाई करवाने में असफल रहता है तो केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय किसी अन्य एजेंसी के द्वारा जन सुनवाई करवायेगा।

लेकिन ऐसा हो नही रहा है। 45 दिनों की बात तो अलग ये जन सुनवाईयां तो 7-8 महीनों बाद हो रही हैं। जन सुनवाई करवाने का अधिकार खो चुका छत्तीसगढ बोर्ड बेशर्मी की सारी हद्दे तोड कर जिला प्रशासन की मदद से जन सुनवाईयां करवा कर कानून का खुला मजाक उडा रहा है।

इंड सिनर्जी  व एम.एस.पी. में जन सुनवाई हुए बिना, पर्यावरण संरक्षण बोर्ड के संरक्षण में  प्लांट  विस्तार का काम युद्ध स्तर पर जारी है। एक की जन सुनवाई इस 29 अगस्त को और दूसरे की  16 सितम्बर को और सिंघल की 19 सितम्बर को होनी है।

कुच्छ दिनों पूर्व ही बोर्ड ने कई स्पंज आयरन उद्योगो का निरीक्षण कर प्लांट बंद करने का नोटिस दिया था। ताज्जुब की बात है कि इन उद्योगो द्वारा फैलाया जा रहा प्रदूषण ही केवल बोर्ड को नजर आया लेकिन उसी परिसर में बिना मंजूरी और बिना जन सुनवाई विस्तार कार्य निरीक्षण टीम को दिखाई नही दिया। जाहिर सी बात है आंखे जरूर बोर्ड की होती है लेकिन  चश्मा उद्योगों का होता है। वही देखती हैं जो उद्योग दिखाना चाहते हैं।

अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि रायगढ जिले के अधिकांश स्पंज व पावर प्लाटों के खिलाफ कोर्ट में केस चल रहे हैं। इनमें इंड सिनर्जी, एम.एस.पी और सिंघल भी शामिल हैं।  कुच्छ ऐसे भी आदतन  है जिन पर दो दो केस चल रहे हैं। नोटिसों की गिनती तो शायद बोर्ड स्वयं भी नही बता पायेगा। अहम सवाल है कि  बोर्ड ने दोषी मानकर ही उद्योगो के खिलाफ कोर्ट में मामले दायर किये होगे,  तो उन्ही दागी उद्योगो को विस्तार या नया प्लांट लगाने की अनुमति क्यों ?  चाकू से हत्या के आरोपी को तोप का लाइसेंस देना कितना जायज है ? बोर्ड की फैलायी गंदगी को न्यायालय  क्यों साफ करे। वो भी तब जबकि कानून ने स्वयं बोर्ड को अधिकार दे रखे हैं कि वह प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगो को बंद करवा सकता है। मामले को अदालत ले जाने के पीछे मंशा ही यही है कि उद्योगो को कोई फौरी नुकसान न हो। हमारे देश की अदालतों का हाल सब जानते हैं। पहले से ही केसो की भरमार से ओव्हरलोड अदालत में मामला जाने का मतलब है दोषी उद्योगो को वर्षो के लिये राहत। सन 2005 में दाखिल 18-20  मुकदमों मे आज तक एक का भी फैसला नही हो पाया है और न ही तत्काल भविष्य में होने की उम्मीद दिखती है। अगर एक आध मामले में किसी को दोषी मान सजा सुना भी दी गई तो हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने में सभी सक्षम है। 5-10 साल वहां लग जाना कोई बडी बात नही है। लेकिन उन निर्दोष ग्रामीणो और आम जनता को क्या राहत मिली जो वर्षो से चिमनीयों के जहर उगलते धुंए से तिल तिल कर हर दिन हर पल मौत की ओर बढने को मजबूर हैं। जमीन उद्योगो के पास चली गई, जो बच गई वो किसी काम की नही रही।

ऐसा नही है कि केवल पर्यावरणीय कानून ही छत्तीसगढ पर लागू नही होते। वन संरक्षण संबंधी कानूनों का भी यही हाल है। साल डेढ साल पहले वन महकमे को भी निरतंर उजडते जंगल और राख से जले पेडो की चिंता हुई। लगभग सभी स्पंज आयरन कारखानों को वन संरक्षण अधिनियम के तहत नोटिस तामील कर केस दर्ज किये गये। साहब के दरबार में उद्योगपतियों ने कई बार हाजिरी भी दी। मामले पेशी दर पेशी खिसकते रहे। कभी साहब नही तो कभी किसी बडे अधिकारी का दौरा। पेशी बढाने के लिये कारणों की कमी आडे नही आती।

चुल्हा जलाने के लिये जंगल से चार लकडी लाने वाले पर सख्त कार्यवाही करने वाला वन विभाग एम.एस.पी जैसे बडे उद्योग के खिलाफ कोर्ट में मामला हार गया। मामला ऊपरी अदालत में ले जाने की बात तो दूर, पूरी फाईल ही आफिस से गायब हो गई। प्लांट से सटे वन विभाग के मुनारे बहुत कुछ कह रहे हैं पर लगता है वर्षों से अधिकारियों के कदम इन घने जंगलो में नही पडे।    

खुले आम कानून से खिलवाड कर जिस गुंडागर्दी से बोर्ड छत्तीसगढ में जन सुनवाईयां करवा रहा है, उनसे जिस कदर जन आक्रोश बढ रहा है वो किसी भी दिन उग्र हो कर प्रदेश की शांति व्यवस्था के लिये घातक हो सकता है। इंड सिनर्जी का यह पहला विस्तार नही है। पहले  विस्तार के लिये भी जन सुनवाई हुई थी, जिसमें भारी हंगामा हुआ था। कई गंभीर आरोप कंपनी पर लगे थे लेकिन तमाम आपत्तियों को दर किनार कर पहले राज्य सरकार ने और फिर केन्द्र सरकार ने विस्तार की अनुमति दे दी। कुच्छ माह पहले रायगढ जिले की तमनार तहसील में कोल मांईस की जन सुनवाई के दौरान जिस बहिशाना तरीके  से ग्रामीणॉं को लाठियों से पीटा गया वो घाव अभी भरे नही हैं। किसी जन सुनवाई में अगर गोलियां भी चल जाए तो आश्चर्य नही होना चाहिये। 

अब वे खाकी से रंगेंगे पूरा कैनवास : साथी रणेंद्र की कविताएँ खाकी से रंगेगे अब वे खाकी से रंगेगे पूरा कैनवास : साथी रणेन्द्र की कविताएँ

Written by Reyaz-ul-haque on 11/28/2009 04:59:00 AM

साथी रणेंद्र की इन कविताओं को पढ़ते वक्त हम उत्पीडन और फासीवाद की उन वैश्विक परम्पराओं से रू-ब-रू होते हैं जो हमारी सत्ता के ज़रिये हम तक भी पहुँच रही है, और हमें इदी अमीन जैसा किसी को चुनने पर हर पांच साल पर विवश होना पड़ता है. पढ़िए इन कविताओं को और डरिये...लेकिन (और अगर आप भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त कवि नहीं हैं तो) इसके बाद उठिए भी. इन हालत के खिलाफ संघर्ष के लिए.


सलवा जुडुमः छह कविताएँ





1
अब वहाँ आकाश नीला नहीं है
न जंगल हरा
न नदियाँ साँवली
न धरती गोरी

बादशाह सलामत ने
 खुरच लिए रंग सारे

अब वे
खाकी से रंगेगे
पूरा कैनवास


2
निचोड़े जा रहे हैं
हरे साँवले जंगल

जमा किया जा रहा है
विशालकाय गढ्ढे में
जीवन-रस

जिसमें
धोई जानी हैं
खाकी वर्दियाँ


3

‘शिकारी आयेगा
दाना डालेगा
लोभ से फँसना नहीं’

यह गीत पंछी नहीं
बहेलिए गा रहे हैं

इरादे बिल्कुल साफ हैं
पंछी विहीन होना है
जंगल को ...
...आकाश को



4
बर्बरता, दानवता, पशुता,
वहशत, हैवानियत, क्रूरता
उत्पीड़न, अनाचार, नृशंसता
आदि-आदि भयावह शब्द सारे

दौड़ते-भागते आए
साँवले जंगल के मुहाने तक
वहाँ खाकी वर्दी को देखा
और शरमा गए



5
जंगलों के ऊपर छाया
यह काला विषैला धुँआ
धुँआ नहीं
बादशाह सलामत की काया की
छाया भर है

बेचैन हैं हुजूर बहादुर
कुछ ढूँढ रहे हैं
चप्पे-चप्पे पर है
उनकी नजर

कई नाम हैं
बादशाह सलामत के
इतिहास के पन्नों से लेकर
भविष्य की पुस्तकों तक
सैकड़ों-हजारों नाम

हम कोई भी एक
चुन सकते हैं...
जैसे ईदी अमीन

अब हम उनकी परेशानी का सबब
ठीक-ठीक समझ सकते हैं

हुजूर की दीर्घतम काया से भी
दीर्घ, भीषण, तीव्र भूख ही
उनकी परेशानी बेचैनी है
और खाली पड़ा है फ्रिजर
एक कोना भी नहीं भरा है
ताजे नरगोश्त से



6
बादशाह सलामत को
‘संस्कृति’ से बहुत प्यार है
प्यारे लगते हैं कवि, आलोचक
कथाकार, संस्कृतिकर्मी बुद्धिजीवी सारे
सम्मानों, पुरस्कारों, पदकों से लकदक

बहुत अच्छी लगती हैं
पद, गीत, कवित्त, चैपाईयाँ
दोहे, पहेलियाँ, मुकरियाँ, सवाईयाँ

छन्द का बंध बहुत भाता है
हुजूर बहादुर को

तुकों और तुकबन्दियों की तो
पूछिए मत
झूमने लगते हैं
दरबार और दरबारी

अब यहूदीवाद का तुक मिलाकर देखिए
उसी वजन का काफिया
स्वराघात, मात्रा, छन्द, बन्ध, राग, लय सब
फिर देखिए हुजूर बहादुर का रंग
उल्लास, उमंग

फड़फड़ाने लगती हैं मूछें
तड़पने लगती हैं
बाहों की मछलियाँ
पूरी काया में स्फुरण
उज्ज्वल भाल पर स्वेदकण

खुद व खुद आ जाती है तलवार
म्यान के बाहर
वही चमचमाती तलवार
आबदार!
आदिम रक्त पिपासु

अदेर किए कूच करती
चतुरंगी सेना
हाथी घोड़ा पालकी
जय कन्हैया लाल की

‘अन्य’ की तलाश में
युगों से जुटी गुप्तचर एजेंसियाँ

माटी के ढूँहों, खेतों के पार
साँवले जंगलों के बीच
माटी के गाँव हैं
जहाँ माटी के गीत गाते
माटी के बेटे साँवले, काले, कुरूप
यही हैं, यही हैं, गद्दार राष्ट्रद्रोही
पापी पातक ‘अन्य’

सर्वव्यापी ईश्वर ‘बाजार’ में
नहीं जिनकी आस्था
जिसकी पूजा-अर्चना-आराधन
से रहते है दूर
हिकारत से भरे पापी कृतघ्न

नया देवता नव्य ईश
साक्षात परम ब्रह्म
जिसके गोद में लहराता है
लुब्ध मध्यवर्ग का जन ज्वार
टीवी, फ्रिज, एयरकंडीशनर
वाशिंग मशीन, लैपटॉप, कार
फ्लैट, ब्रान्डेड कपड़े, ऐशो आराम अपरम्पार
मीलों लम्बी जिसकी
चमचमाती लिस्ट के साथ सोया
यौन सुख में डूबा
अघाया मध्यवर्गीय धार
जिसके सित्कारों से
अश्लील हो गई हैं
दसों दिशाएँ
जिनमें कर रहा सौन्दर्य सन्धान
नया भगवान
जिसकी उँगलियों की डोर में
बँधी सारी पुतलियाँ

इन लहरों से दूर
सूखा असिंचित साँवला जंगल
बुदबुदाता गाता गुनगुनाता
साँप काटे का मंत्र
या प्रतिकार-प्रतिरोध का गीत
यही है, यही है गद्दार, राष्ट्रद्रोही
पापी पातक ‘अन्य’

हुलका कर, ललकार कर
घेर कर हाँक कर, चिन्हित कर लेगी सेना
उतारेगी अन्तहीन गहरी काली सुरंग में
फिर पूरी तहजीब
और सलीके से
भरी जायेगी मिट्टी
रोपे जायेंगें सूर्ख गुलाब

जैसा सन् चैरासी में
बड़े पेड़ के गिरने से
धरती हिली खुली सुरंग
या दो हजार दो में
क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया
ठीक-ठीक वैसे ही
पहचाना गया है ‘अन्य’ को
सारी सावधानी और महीनी के साथ

हाइपर एक्टिव हैं
सम्मानों, पुरस्कारों, पदकों
से लकदक लदे अतिविनम्र
कविगण, आलोचक, कथाकार
संस्कृतिकर्मी बुद्धिजीवी सारे
शोक संदेशों, भाषणों,
प्रेस विज्ञप्तियों के प्रारूपण में
व्यस्त, अति व्यस्त,
पसीने से लथपथ
कई-कई पाठ कर चुके
बस आखिरी प्रारूप बाकी है।

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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