हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग-3)

Posted by चन्द्रिका on 6/01/2012 06:35:00 PM

अपवाद नहीं, नियम हैं साक्षी 
-दिलीप खान
क्रमवार लिंक

गुवाहाटी में चलने वाला ऊ लाला एफएम रेडियो द डर्टी
 पिक्चर फिल्म के
गाने  से पहले से बाज़ार में है और लोकप्रिय है
इधर बीच नज़र दौड़ाए तो पत्रकारों को राज्यसभा भेजने का प्रचलन लगातार बढ़ा है। बीते कुछ सालों में बड़े कॉरपोरेट और पत्रकारों की चहलकदमी राज्यसभा के गलियारों में तेज हुई है। चाहे वो सीएमवाईके प्रिंटेक लिमिटेड के मालिक चंदन मित्रा हो चाहे लोकमत न्यूज़ प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष विजय दर्डा। पार्टी और विचारधारा अलग-अलग हो सकती है लेकिन प्रचलन एक है। चंदन मित्रा पायनियर के मालिक हैं, जो अंग्रेज़ी और हिंदी में अख़बार निकालने के अलावा पत्रकारिता का एक संस्थान भी चलाते हैं। विजय दर्डा का लोकमत समूह मराठी में लोकमत, हिंदी में लोकमत समाचार और अंग्रेज़ी में लोकमत टाइम्स निकालने के साथ-साथ टीवी-18 समूह के साथ साझा उपक्रम में आईबीएन-लोकमत नाम से मराठी न्यूज़ चैनल भी चलाता है। व्यवसाय, राजनीति और मुनाफे के शुद्ध मिश्रण के तले नेता मीडिया मंडी में उतर रहे हैं। कांग्रेस के रसूखदार नेता राजीव शुक्ला अपनी पत्नी अनुराधा प्रसाद के साथ ब्रॉडकास्ट इंडिया लिमिटेड के तहत न्यूज़ 24 टीवी चैनल चलाने के साथ-साथ एक स्वतंत्र प्रोडक्शन हाउस भी चलाते हैं। बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड नाम का यह प्रोडक्शन हाउस टीवी धारावाहिक की दुनिया में काफ़ी मशहूर है। इसके अलावा आपनो 24, ई 24 नाम के चैनल और रेडियो धमाल भी राजीव शुक्ला और अनुराधा प्रसाद की ही मिल्कियत है। इंटरनेशनल स्कूल ऑफ मीडिया एंड इंटरटेनमेंट इंस्टीट्यूट के बैनर तले वो मीडिया कर्मियों को प्रशिक्षण भी देते हैं। अतिरिक्त सूचना यह है कि अनुराधा प्रसाद रिश्ते में बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद की बहन है। राजीव शुक्ला टीवी में हाथ आजमाने के साथ ही बेशुमार पैसा वाले धंधा क्रिकेट में भी खासा रुचि रखते हैं। बीसीसीआई में कई महत्वपूर्ण ओहदा संभावलने के अतिरिक्त अभी-अभी संपन्न आईपीएल के वो कमीश्नर (अध्यक्ष) थे। कमीश्नर यानी ललित मोदी वाला पद।  पीवी नरसिंहा राव की सरकार में मंत्री रह चुके हरियाणा के कांग्रेस नेता विनोद शर्मा इनफॉरमेशन टीवी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के बड़े शेयरधारक हैं। यही कंपनी हमारे बीच इंडिया न्यूज़ नाम का टीवी चैनल और आज समाज नाम का अख़बार लेकर आती है।
राजनेताओं के साथ मीडिया के गठजोड़ की जब भी चर्चा उठती है लोग दक्षिण भारत का नाम ले लेते हैं। यह ज़रूर है कि दक्षिण भारत में यह प्रचलन ज़्यादा वृहद और पुराना है लेकिन कमोबेस यह प्रैक्टिस भारत के हर कोने में समान है। पता नहीं द डर्टी पिक्चर में लिखा गया गाना ऊ ला ला...किससे प्रेरित है, लेकिन इसी नाम का एफ एम चैनल गुवाहाटी में काफ़ी लोकप्रिय है जिसके मालिक कभी कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से मंत्री रह चुके, कभी पार्टी ने निष्कासित हो चुके और फिर वापसी कर चुके मतांग सिंह हैं। पॉजिटिव रेडियो प्राइवेट लिमिटेड नाम की उनकी कंपनी रेडियो ऊ लाला चलाती है और पॉजिटिव टेलीविजन प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के बैनर तले मतंग सिंह एन.ई. टीवी, फोकस टीवी, एनई बांग्ला, एनई हाई फाई, हमार और एचवाई टीवी चलाते हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से असम में मंत्री पद पर रहने वाले हेमंत बिश्व शर्मा की पत्नी रिंकी भुयन शर्मा प्राइड ईस्ट इंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड की मालकिन हैं और न्यूज़ लाइव तथा रंग नाम का चैनल चलाती हैं। दशरूपा इंजीनियरिंग एंड पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड के मालिक अंजन दत्ता अजीर दैनिक नाम का अख़बार चलाते हैं और लोग उन्हें कांग्रेस विधायक के तौर पर भी जानते हैं। असम में ही जनसाधारण प्रिटिंग्स एंड पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी जनसाधारण अख़बार निकालती है और इसके मालिक रोकिबुल हुसैन हैं जो राज्य में कई बार मंत्री रह चुके हैं। ऐसा नहीं है कि असम में सिर्फ़ कांग्रेस के ही नेता मीडिया में हाथ आजमा रहे हैं बल्कि असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बदरुद्दीन अजमन की कंपनी यूनिटी मीडिया एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड गणाधिकार नामक अख़बार निकालती है। अजमल एयूडीएफ के अलावा दारुल उलूम देवबंद से भी संबंधित हैं और असम के बड़े कारोबारी हैं।
इसलिए मेरी नज़र में मीडिया में नेताओं के निवेश को दक्षिण की परिघटना कहने वाले लोग बड़ी भूल कर रहे हैं। पंजाब दक्षिण में नहीं है और न ही असम, हरियाणा भी दक्षिण का राज्य नहीं है और नागालैंड तो कतई नहीं। नागालैंड के मुख्यमंत्री नीफ्यू रियो नागालैंड फ्री प्रेस नामक कंपनी के भी मालिक हैं जोकि ईस्टर्न मिरर नामक अख़बार निकालती है। जगनमोहन रेड्डी के साक्षी को इसलिए नेता-मीडिया गठजोड़ के बड़े मिसाल के तौर जाना जाता है क्योंकि पांच साल के भीतर ही साक्षी देश के शीर्ष 10 दैनिकों में शुमार हो गया। लेकिन वाईएसआर के गुजरने के बाद साक्षी के रुतबे और बैंक खाते पर भी असर पड़ा। और वित्तीय तौर पर पछाड़ खाने के बाद जब दिसंबर 2011 में साक्षी ने अपनी कीमत 2.50 रुपए से बढ़ाकर 3 रुपए किया तो जगनमोहन रेड्डी ने अख़बार में लिखे गए खत में यह बताने की कोशिश की कि असल में यह पूरा मामला पीले ब्रिगेड की साजिश का नतीजा है। पीला तेलुगुदेशम पार्टी का रंग है और पीले ब्रगेड से यहां आशय टीडीपी के साथ-साथ इनाडु और आंध्र ज्योति अख़बार से है। इससे पहले जून 2009 में साक्षी ने अपनी कीमत 2 से बढ़ाकर 2.5 रुपए किया था। अपनी शुरुआत के वक्त साक्षी की क़ीमत 2 रुपए थी और उस समय जगन रेड्डी विरोधी अख़बारों को लेकर लगातार फिकरे कसते रहते थे कि अगर साक्षी से मुकाबला करना है तो क्यों नहीं वे भी अपनी क़ीमत 2 रुपए कर देते हैं। जगन के इस बात से नाराज होकर आंध्र ज्योति के संपादक राधाकृष्णा ने लिखा था, अगर मैं किसी मुख्यमंत्री का बेटा होता और मेरे पास अनअकाउंटेड धन होता तो मैं मुफ्त में अख़बार बांटता।
कलानिधि मारन: देश में सार्वाधिक वेतन प्राप्त व्यक्ति
मीडिया को लेकर यह प्रतिस्पर्धा आंध्र के कोने-कोने में देखी जा सकती है। लेकिन तमिलनाडु में यह स्थापित सत्य की तरह हो गया है कि हर अख़बार और टीवी चैनल का किसी न किसी पार्टी के साथ गठजोड़ है। बड़े नाम से शुरू करें तो एआईडीएमके की मुखिया और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता मैविस सैटकॉम लिमिटेड कंपनी की मालकिन हैं और उनकी यह कंपनी अलग-अलग ब्रांड नेम से तमिलनाडु में कई टीवी चैनल चलाती है। जया टीवी, जया मैक्स, जया प्लस और जे मूवीज इनमें प्रमुख हैं। लेकिन जयललिता का मीडिया साम्राज्य कलानिधि मारन के सामने बेहद छोटा है। क्या आपको मालूम है कि भारत में सबसे ज़्यादा वेतन पाने वाला व्यक्ति कौन हैं? अगर आपका उत्तर मुकेश अंबानी है तो आप सामान्य बोध के आधार पर ग़लत दिशा में भटक रहे हैं। सही उत्तर है- कलानिधि मारन।  
कलानिधि मारन देश के सबसे बड़े टीवी समूहों में से एक सन टीवी नेटवर्क लिमिटेड के मालिक हैं। कल रेडियो लिमिटेड, साउद एशिया एफएम लिमिटेड और कल पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड भी कलानिधि मारन की ही मिल्कियत हैं। अपनी पत्नी सहित वो इन कंपनियों के 77 फ़ीसदी शेयर पर कब्जा रखते हैं। लगभग दर्जन भर से ज्यादा टीवी चैनल उनके नाम हैं। सन टीवी, सन न्यूज़, केटीवी, सन म्यूजिक, चुट्टी टीवी, सुमंगली केबल, आदित्य टीवी, चिंटू टीवी, किरण टीवी, खुशी टीवी, उदय कॉमेडी, उदय म्यूजिक, जैमिनी टीवी, जैमिनी कॉमेडी और जैमिनी मूवीज जैसे टीवी चैनलों के अलावा सूर्या एफएम और रेड एफएम उनका ही है। रेड एफएम, बजाते रहो! तमिल का बड़ा अख़बार दिनाकरण भी कलानिधि मारन ही निकालते हैं। कलानिधि मारन से अगर संक्षेप में आपका परिचय कराएं तो हम कह सकते हैं कि वो डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मुरासोली मारन के बेटे और दयानिधि मारन के भाई हैं। इसके साथ-साथ तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की बहन के वो पोते हैं। लेकिन कलानिधि मारन के मीडिया समूह से एम करुणानिधि पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, इसलिए उन्होंने कलाइगनार टीवी प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की और कलाइगनार टीवी के मालिक बन गए। डीएमके के करीबी व्यवसायी एम राजेंद्रन राज टीवी नेटवर्क लिमिटेड में 11 फीसदी शेयरधारक हैं। इस तरह राज टीवी और राज डिजिटल प्लस नामक चैनल भी डीएमके के कब्जे में हैं।
अंबुमनी रामदॉस के पिता और पीएमके प्रमुख एस रामदॉस मक्काल टीवी चलाते हैं और मक्काल थोलई थोडारपु कुझुमम लिमिटेड के वो सबसे बड़े शेयरधारक हैं। कांग्रेस नेता एच. वसंतकुमार भी न्यूज़ मीडिया में सक्रिय हैं। वो तमिलनाडु में वसंत टीवी चलाते हैं। कांग्रेस के ही सांसद और पूर्व मंत्री केवी थंगबालू मेगा टीवी के मालिक हैं। उनकी कंपनी का नाम हैं, सिल्वरस्टार कम्यूनिकेशंस लिमिटेड। कर्नाटक और केरल में भी नेताओं का मीडिया से अच्छी दोस्ती है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी की पत्नी अनीता कुमारस्वामी कन्नड़ कस्तूरी टीवी चैनल की मालिकन हैं। लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता मुरली (जिनका 2009 में निधन हो गया) केरल में कैराइल टीवी और पीपुल टीवी चलाते थे। मुस्लिम लीग से संबद्ध एम के मुनीर इंडियाविजन नामक टीवी चैनल के मालिक हैं। इसी चैनल की फादर कंपनी इंडियाविजन सैटेलाइट कम्यूनिकेशंस लिमिटेड में केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 20 करोड़ रुपए का निवेश किया है।
बीजू जनता दल के सांसद बैजंत जे पांडा की पत्नी जगी मंगत पांडा ओडिसा टेलीविजन लिमिटेड के तहत चलने वाले ओटीवी की मालकिन हैं। ओटीवी ओडिसा का सबसे लोकप्रिय क्षेत्रीय टीवी चैनल है। पूर्व मुख्यमंत्री जेबी पटनायक के दामाद और उद्योग मंत्री रहे निरंजन पटनायक के भाई सौम्या रंजन पटनायक ओडिसा से निकलने वाले दैनिक अख़बार संबाद, कनक टीवी और रेडियो चॉकलेट के मालिक हैं। ईस्टर्न मीडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के वो मालिक हैं।
तो जाहिर है कि पूरब-पश्चमि-उत्तर-दक्षिण में मीडिया-राजनेता के बीच के संबंध लगातार गहरे होते जा रहे हैं। जगन रेड्डी के साक्षी पर सीबीआई के कसे गए शिकंजे से इस प्रचलन में कोई कमी आएगी, ऐसा नहीं है। हां, यह ज़रूर है कि मीडिया को विस्तार देने में अब ज़्यादा सावधानी बरती जाएगी। जगन पर कई गंभीर आरोप हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने साक्षी शुरू करने के लिए कई फ़र्ज़ी कंपनियों का सहारा लिया और उन कंपनियों से बरास्ते मॉरिशस आने वाले पैसों को जगति प्रकाशन में झोंका। मॉरिशस टैक्स हैवन कंट्री है, जहां से निवेश करने में भारत सरकार कई करों में छूट देती है और यही वजह है कि ज़्यादातर यूरोपीय और अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश करने से पहले मॉरिशस में एक ठौर ढूंढ़ती है और फिर इधर का रुख करती है। आंध्र ज्योति और इनाडु ने जगन के ख़िलाफ़ शुरू किए गए अभियान में यह भी दिखाया कि किस तरह एपीआईआईसी (आंध्र प्रदेश इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इंडस्ट्रीयल कॉरपोरेशन) के पैसों को जगति प्रकाशन में लगाया गया।

मीडिया एक ऐसा धंधा है जिसके बारे में कई जानकार बताते हैं कि काले धन को सफ़ेद करने में इस कारोबार से बेहतर कोई दूसरा काम नहीं है। 2004 में जगनमोहन रेड्डी जब कडप्पा से चुनाव लड़ रहे थे तो चुनाव अधिकारी को सौंपे गए ब्यौरे में उन्होंने अपनी आमदनी 10 लाख रुपए बताई थी। अगस्त 2011 में जगन ने घोषणा की कि उनके पास 365 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति है। इसके अलावा 41.33 करोड़ रुपए की संपत्ति उनकी पत्नी के नाम अलग से थी। जगन की संपत्ति में वृद्धि दर को अंकगणित के प्रश्न के तौर पर विद्यार्थियों से प्रतियोगिता परीक्षा में पूछा जाना चाहिए। 2004 में 9.18 लाख रुपए से बढ़कर यह 2009 में 77 करोड़ हुई, फिर 2011 में बढ़कर 365 करोड़ हुई। परीक्षार्थी कुल वृद्धि दर की गणना करें! सही उत्तर: 3 लाख 90 हज़ार फीसदी से ज़्यादा। इस दौरान जगन अगर भारत के किसी भी बैंक में वो पैसा जमा किए होते तो हद-से-हद 20 लाख रुपए तक पहुंच पाते। इससे साबित होता है कि बैंक में पैसा रखना प्रगति की राह में रोड़ा है। प्रगति अगर कहीं है तो मीडिया में है

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है (भाग- 2)

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/31/2012 08:20:00 PM


पार्टी मुखपत्र का ज़माना लद गया
-दिलीप खान

इससे पहले इन दोनों लिंक पर घूम आए

वाईएसआरकी छवि के बाद जगन के पास राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली बनने के लिए जो सबसे अहम हथियारहै, वो है साक्षी। यह जगन भी जानते हैं और विरोधी पार्टियां भी। इसलिए बाकी पार्टियांजगन से ज़्यादा उसके मीडिया समूह पर निशाना साध रहे हैं और जगन अपने मीडिया समूह केबचाव को खुद का बचाव समझते हुए लगभग अभियान चलाए हुए हैं। आंध्र प्रदेश में यदि साक्षी-जगनमोहनके रिश्तों की पड़ताल होती है तो इसके साथ-साथ इनाडु और टीडीपी के रिश्तों की भी होनीचाहिए, क्योंकि जगन का हमेशा ये तर्क रहा है कि उन्होंने इनाडु-रिलायंस-टीडीपी की दुरभिसंधिको ध्वस्त करने के लिए ही अपना अख़बार शुरू किया। मुख्यमंत्री किरण रेड्डी उस समय बेहदपरेशान थे जब मुख्यमंत्री के दौर में चलने वाले हर उम्मीदवार पर साक्षी चोट कर रहाथा। चाहे किरण रेड्डी हो, चाहे रोसैया। किरण रेड्डी के पास ऐसा कोई मीडिया नहीं हैजो खुलकर उनकी सलामी बजाए। टीडीपी के पास है, वाईएसआर कांग्रेस के पास है। असल मेंआंध्र में कांग्रेस पार्टी के भीतर ही कई गुट हैं। इसलिए एक आम राय किसी ख़ास नेताके बारे में मीडिया में नहीं उभर पाती। हां, किरण के पास मुश्किल ही सही लेकिन रास्तेहैं। इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल उन्होंने अभी जगन के ख़िलाफ़ किया। सीबीआई की छापेमारीको सीधे-सीधे किरण की बाजी न भी कहें तो साक्षी में दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनोंपर पाबंदी कुछ ऐसा ही कदम है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं निकाला जाना चाहिए कि आंध्रमें कांग्रेस पार्टी मीडियाविहीन है। कांग्रेस सांसद टी सुब्बीरामी रेड्डी के भतीजेटी वेंकटरामी रेड्डी का दक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स कंपनी में 21 फ़ीसदी शेयर है। इसतरह दक्कन क्रॉनिकल, एशियन एज, फाइनेंसियल क्रॉनिकल और आंध्र भूमि में उनकी बड़ी हिस्सेदारीहै। साक्षी प्रकरण में इन अख़बारों की सरकारी भूमिका और पक्षधरता इस बात को पुख्ताकर रही थी कि कम से कम आंध्र प्रदेश में मीडिया अब राजनीतिक तौर पर टुकड़ों में बंटचुका है।
प. बंगाल में कुछ अखबारों पर लगी पाबंदी को बयान करता कार्टून 
असलमें पार्टी मुखपत्र का जमाना अब लद गया। राजनीतिक दल यह जानने लगे हैं कि मुखपत्र कोया तो पार्टी कैडर पढ़ते हैं या फिर आलोचना के वास्ते विरोधी पार्टियां। हद से हद किसीविषय पर पार्टी का पक्ष जानने के लिए मीडिया उससे गुजरता है। लेकिन मीडिया की मौजूदागति मुखपत्र की बजाए रोजमर्रा के स्रोतों से ख़बर जमा करने की वजह से ही कायम हुई है।इस लिहाज से मुखपत्र उनके एजेंडे में उपयुक्त नहीं बैठता। लेकिन राजनीतिक पार्टी केनजरिए से सोचें तो यदि मीडिया मुखपत्र को पढ़ता भी है तो इससे पार्टी को कितना लाभहोगा? कोई ज़रूरी नहीं है कि उसी राजनीतिक नजरिए से मीडिया पार्टी की बात को जनता केबीच रखे। इसलिए बरास्ते मीडिया अपनी बात रखने-रखवाने में राजनीतिक दलों और नेताओं कोएक अवरोध तो दिखता ही है। ज़्यादा मुफीद यह होगा कि मुखपत्र के जरिए मीडिया तक बातपहुंचाने की बजाए सीधे मीडिया के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुंचाए। नेताओं ने इस योजनापर बीते वर्षों में तेजी से काम किया है और अब वो सीधे-सीधे मीडिया के मालिक बन रहेहैं। भारतीय राजनीति में ये हाल के बदलाव हैं, लेकिन बड़े बदलाव हैं। अपनी राजनीति,अपनी ख़बर, अपना मीडिया।
दक्षिणभारत में सघन दिखने वाला मीडिया-राजनीति का यह रूप धीरे-धीरे पूरे देश में फैल रहाहै। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में घोषणा की कि वो पार्टीकी तरफ़ से नया अख़बार और टीवी चैनल लॉन्च करेंगी। नाम तक उन्होंने जाहिर कर दिया।दैनिक पश्चिमबंग और पश्चिमबंग टीवी। इस नामकरण और घोषणा को एक ख़ास पृष्ठभूमि में ममताने पेश किया। उन्होंने पहले राज्य के सरकारी पुस्तकालयों में अंग्रेज़ी अख़बार सहितकुछ बड़े बांग्ला अख़बारों पर यह कहकर पाबंदी लगा दी कि वो राजनीतिक तौर पर पूर्वाग्रहीसमाचारपत्र हैं। फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि तृणमूल कांग्रेस के काम-काजोंको चूंकि ये अख़बार ठीक से जनता के बीच पेश नहीं कर पाते, इसलिए जनता तक बात पहुंचानेके लिहाज से वो मीडिया में हाथ आजमा रही हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में ऐसे कई मीडियासमूह हैं जिनपर तृणमूल कांग्रेस की अच्छी पकड़ है। आरपी ग्रुप के चैनल कोलकाता टीवीको तृणमूल कांग्रेस ने बेल-आउट के लिए संपर्क किया था। तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ सेराज्यसभा सांसद स्वपन सदन बोस यानी टुटू बोस संबाद प्रतिदिन नाम से अख़बार चलाते हैं।प्रतिदिन प्रकाशन के वो मालिक हैं। बंगाल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड जो चैलन-10 चलातीहै वो तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हमेशा ख़बर चलाता है। इसके मालिक शांतनु घोष औरश्रीमति सुदेशना घोष तृणमूल के प्रति वफ़ादार हैं। इस वफ़ादारी की कहानी काफी पुरानीहै। सीपीएम के कब्जे में भी मीडिया है। आकाश बांग्ला और ज़ी न्यूज़ के साझा उपक्रमज़ी आकाश में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले अवीक दत्ता सीपीएम कार्यकर्ता हैं। वो सीपीएमके पत्र गणशक्ति के सहायक संपादक हैं और सीपीएम के छात्र नेता रह चुके हैं। अवीक दत्तान सिर्फ़ आकाश बांग्ला चलाते हैं बल्कि एक और टीवी चैनल 24 घंटा भी चलाते हैं।
अबतकरीबन हर राज्य में राजनीतिक पार्टियों के बीच मीडिया का बंटवारा हो रहा है। या तोखुद राजनेता ही मीडिया कारोबार में उतर जा रहे हैं या फिर संपादकों को राज्यसभा जानेकी उम्मीद जगाकर अपने पक्ष में कर ले रहे हैं। बहुत दिन नहीं हुए जब बिहार के मीडियापर प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काट्जू ने टिप्पणी की थी कि वहां का मीडियाआज़ाद नहीं है। जाहिर है जवाब सरकार को देना चाहिए, लेकिन झारखंड के एक बड़े अख़बार,जोकि बीते कुछ सालों से बिहार के बाज़ार में भी संभावना तलाश रहा है, ने काट्जू केबयान के विरोध में दो पेज का लेख छापा। अख़बार के प्रधान संपादक ने उसे लिखा था, जिनकेबारे में आजकल चर्चा गरम है कि वो जनता दल (यूनाइटेड) की तरफ़ से राज्यसभा आने की हरसंभवकोशिश में लगे हैं। झारखंड में मीडिया, राजनेता और कॉरपोरेट की भूमिका पर यहां चर्चाकरना बहुत मुफ़ीद नहीं है, लेकिन संक्षेप में यह बता दिया जाए कि झारखंड और बिहार सेनिकलने वाले प्रभात ख़बर की फादर कंपनी ऊषा मार्टिन खनन कारोबार में भी संलग्न है।जाहिर है राजनेताओं के साथ गठजोड़ उनकी ज़रूरत है। उसी राज्य से अनाधिकारिक तौर परयह ख़बर भी मिल रही है कि देश में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले हिंदी अख़बारों मेंसे एक ने जिंदल ग्रुप के साथ यह समझौता किया है कि वो जिंदल के पक्ष में अगले पांचसाल तक स्टोरी करेगा। बिहार के मीडिया में प्रकाश झा के पैसों की बहुत चर्चा है औरलोग जानते हैं कि प्रकाश झा का जनता दल (यू) के साथ क्या संबंध है।
वापसआंध्र प्रदेश चलते हैं। वहां जनाधार को विस्तार देने की खातिर हर बड़ी पार्टी ने अपना-अपनामीडिया खोल रखा है या यूं कहें कि हर मीडिया वाली राजनीतिक पार्टी बड़ी पार्टी बन गईहै। तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव टी-न्यूज़ नाम से चैनल चलातेहैं। चंद्रशेखर राव तेलंगाना ब्रॉडकास्टिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के मालिकहैं और यही कंपनी टी-न्यूज़ चैनल की फादर कंपनी है। अलग तेलंगाना के मुद्दे को लेकरसबसे बड़े नेता के तौर पर चंद्रशेखर राव के उभार में उनकी पृथक पार्टी के साथ-साथ इसचैनल का भी बड़ा योगदान है। इस तरह साक्षी कोई अपवाद नहीं बल्कि वहां की राजनीति केलिए नियम है।
मुकेश अम्बानी और नीमेश कम्पानी: मीडिया खेल के बाजीगर 
मीडियाबाज़ार की गुपचुप शैली में यह पता लगाना काफ़ी मुश्किल है कि किस कंपनी के साथ किसकाहित नत्थी है। साक्षी ने शुरुआत से ही लगातार यह इल्जाम लगाया कि इनाडु, रिलायंस औरटीडीपी के चंद्रबाबू नायडू के बीच गठजोड़ है। इसी बीच इनाडु ने यह आधिकारिक घोषणा कीकि उषोदया इंटरप्राइजेज में 40 प्रतिशत शेयर ख़रीदने के साथ ही ईटीवी के 10 चैनलोंके सौ फ़ीसदी शेयर का मालिक रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड हो गया है। सिर्फ तेलुगू ईटीवीऔर ईटीवी-2 पर रामोजी राव की पकड़ कायम रही, जहां वो 51 फ़ीसदी और रिलायंस 49 फ़ीसदीशेयर के मालिक हैं। इस तरह साक्षी के आरोप को बल मिला। साक्षी ने यह भी कहा कि नीमेशकंपानी के मार्फत रिलायंस ने उषोदया इंटरप्राइजेज में जो निवेश किया है वो इसलिए हैताकि केजी बेसिन मामले में रिलायंस को चंद्रबाबू नायडू का लाभ मिल सके। उस समय साक्षीने यह दावा किया कि खरीद-बिक्री का ये पूरा मामला फर्जीवाड़े पर आधारित है और अगर कोर्टमें मामला साबित हो गया तो रामोजी राव पर 7700 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लग सकता है।
लेकिनजानकारी, सूचना और आरोप-प्रत्यारोप का यह अद्भुत दौर है। इनाडु-रिलायंस के जिन रिश्तोंको जोड़-शोर से साक्षी ने उठाया उसका दूसरा सिरा पकड़ते हुए टीडीपी नेता रेवंत रेड्डीने दिसंबर 2011 में एक नया रहस्योद्घाटन किया। उनका आरोप है कि नीमेश कंपानी ने जगनमोहनरेड्डी के साक्षी मीडिया समूह में भी निवेश किया है। रेवंत का कहना है कि जेएम फाइनेंसिल्स,लैटिट्यूड और मर्केंटाइल प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष नीमेश कंपानी ने 27.65 करोड़रुपए मेटाफर रियल एस्टेट एंड प्रोजेक्ट्स लिमिटेड में निवेश किया जोकि पटलूरी वाराप्रसाद की कंपनी है। रियल एस्टेट का धंधा करने वाले प्रसाद को वाईएस राजशेखर रेड्डीपरिवार का करीबी माना जाता है। तो कहानी यह है कि प्रसाद की कंपनी में 27.65 करोड़लगाने के एवज में नीमेश कंपानी ने प्रसाद को इस बात के लिए तैयार किया कि वो जगति प्रकाशनमें कुछ निवेश करे और डील के मुताबिक प्रसाद ने बाद के दिनों में जगनमोहन रेड्डी केजगति प्रकाशन में 10 करोड़ रुपए का निवेश किया।
मीडियाअध्ययन में मीडियाटाइजेशन का सिद्धांत है जिसमें यह बताया गया है कि किस तरह मीडियाआज की राजनीति को संचालित करता है। एजेंडा सेटिंग जैसे सिद्धांत से यह महत्वपूर्ण अर्थमें भिन्न है। एजेंडा सेटिंग सिर्फ यह बताता है कि मीडिया किसी देश में एक कम महत्वपूर्णमुद्दे को भी सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर स्थापित करने की शक्ति रखता है, लेकिन मीडियाटाइजेशनयह कहता है कि असल में राजनीति की दिशा और दशा दोनों को मोड़ने में आज का मीडिया बेहदमहत्वपूर्ण हो गया है। इस तरह अगर किसी राजनेता या पार्टी के पास मीडिया है तो वह विरोधीपार्टी से एक हाथ ऊपर है। इसमें राज्य मायने नहीं रखता। आंध्र प्रदेश हो चाहे तमिलनाडुया फिर पंजाब, मीडिया अपने असर के मामले में स्थान निरपेक्ष है। शिरोमणि अकाली दल केसुखबीर सिंह बादल सिर्फ पार्टी में मालिकाना भाव नहीं रखते बल्कि वो पंजाब के लोकप्रियटीवी चैनल पीटीसी और पीटीसी न्यूज़ के भी मालिक हैं। जी-नेक्स्ट मीडिया प्राइवेट लिमिटेडनाम की उनकी मीडिया कंपनी है। बीते दिनों संपन्न हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में जब राजनीतिकप्रचार अभियान चल रहा था तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सहित अन्य कई नेताओं ने बादलपरिवार पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने अपने चैनल को पार्टी के प्रचार का मंच बना रखाहै। पंजाब के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब एक ही पार्टी ने दुबारा सत्ता में वापसीकी। शिरोमणि अकाली दल को बड़ी जीत हासिल हुई। कुछ-न-कुछ राहुल गांधी के आरोप में तोवजन होगा, कुछ-न-कुछ पीटीसी न्यूज़ का तो असर होगा!

जगनमोहन रेड्डी यानी भारत में मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट का नहीं है.

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/29/2012 06:33:00 PM

मेरी राजनीति, मेरा मीडिया
-दिलीप खान
साक्षी मीडिया समूह को स्थापित करने के दौरान की गई कथित वित्तीय अनियमितता के आरोप में 27 मई को सीबीआई ने अंतत: कडप्पा के सांसद जगनमोहन रेड्डी को गिरफ़्तार कर लिया। जगन की गिरफ़्तारी का यह फांस बीते एक महीने से सीबीआई तैयार कर रही थी। जांच-पड़ताल अभी जारी है और सीबीआई ने जिन 75 लोगों की सूची तैयार की है उनमें से कुछेक को जगन से पहले ही हिरासत में ले लिया गया है। 8 मई को सीबीआई ने चार बैंको को यह आदेश दिया था कि साक्षी अख़बार चलाने वाले जगति प्रकाशनसाक्षी टीवी चलाने वाली इंदिरा टीवी और जननी इंफ्रा के खातों को सील कर दिया जाए। सीबीआई के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ जगन ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में अपील याचिका दायर की और 23 मई को न्यायाधीश बी चंद्र कुमार ने फैसला सुनाया कि एसबीआईआईओबी और ओबीसी बैंक खातों पर सीबीआई द्वारा लगाई गई रोक ख़त्म की जाए। इस अदालती फैसले का आनंद उठाने के लिए अभी भरपूर समय भी नहीं मिला था कि जगन को हिरासत में जाना पड़ा। सीबीआई द्वारा खाता सील करने के फ़ैसले के बाद जो दूसरी घटना घटी वह मीडिया के संबंध में महत्वपूर्ण है। आंध्र प्रदेश सरकार ने सीबीआई कार्रवाई के बिनाह पर यह फैसला किया कि चूंकि जगन के कारोबार में लगे पैसों को लेकर जांच चल रही है इसलिए जनहित’ में यही होगा कि साक्षी अख़बार और साक्षी टीवी के सारे सरकारी विज्ञापन रद्द किए जाए। और इस तरह साक्षी को मिलने वाले विज्ञापन बंद हो गए। एक ऐसे अख़बार और टीवी को मिलने वाले विज्ञापन बंद हुए जिनके लिए सारे नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और जगनमोहन रेड्डी के पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी ने ज़्यादा ऊंचे मूल्य पर लगातार विज्ञापन मुहैया करवाया और जिनको लेकर विरोधी मीडिया समूह लगातार यह आवाज़ उठाते रहे कि मुख्यमंत्री पिता का नाजायज फायदा उठाने की वजह से ही साक्षी का साम्राज्य खड़ा हुआ है। इस लेख में साक्षी के उदय से लेकर इस समय तक के सफर में आंध्र के मीडिया में मची खींचतान और मीडिया में राजनीतिक पार्टियों व राजनेताओं के निवेश और गठजोड़ की पड़ताल की जाएगी। पूरा लेख लगभग 6000 शब्द का है, इसलिए तीन खंड में इसे ब्लॉग पर प्रकाशित किया जाएगा। 


पहला भाग
सीबीआई जांच शुरू होने के समय से ही जगन रेड्डी का पलटवार रहा है कि 12 जून को आंध्र प्रदेश की 18 विधानसभा और गुंटूर लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से वाईएसआर कांग्रेस के ख़िलाफ सत्ताधारी कांग्रेस और तेलुगूदेशम पार्टी मिली-जुली रणनीति पर काम कर रही है। जगन जब भी राजनीतिक बयान देते हैं तो कांग्रेस और तेलुगूदेशम पार्टी को एक पांत में रख देते हैं। इसकी वजह है। वजह यह है कि चूंकि कांग्रेस से बागी होकर ही जगन निकले हैं और कांग्रेस अभी सत्ता में है तो राज्य द्वारा लिए जाने वाले फ़ैसलों पर सवाल उठाने के लिए कांग्रेस को घेरना ज़रूरी हैलेकिन टीडीपी को घेरने में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा को भी वे मिला देते हैं। इसलिए टीडीपी का जिक्र करते ही इनाडु मीडिया समूह का नाम लेना वो नहीं भूलते। टीडीपी और इनाडु का एकसाथ नाम लिया जाना एक तरह से जगन के लिए नैतिक बचाव का मामला बनता है। जगन यह साबित करना चाहते हैं कि यदि वाईएसआर कांग्रेस के पास साक्षी मीडिया समूह है तो बाकी राजनीतिक दल भी किसी न किसी मीडिया के कंधे पर सवार हैं। आंध्र की राजनीति में मीडिया की भूमिका को परखने पर कई दिलचस्प तथ्य नज़र आते हैं।
वाई एस राजशेखर रेड्डी के दूसरे कार्यकाल के शपथग्रहण के समय से ही रेड्डी गुट का आरोप था कि इनाडु समूह कांग्रेस सरकार (उस समय जगन और राजशेखर रेड्डी कांग्रेस में ही थे) के ख़िलाफ़ गलतबयानी कर रहा है और इसलिए पारिवारिक सहमति के बाद इनाडु के प्रचार को काटने के लिए वाईएसआर ने अपने बेटे जगनमोहन रेड्डी के हाथ में ये ज़िम्मेदारी सौंपी कि वो मीडिया का एक ऐसा समूह विकसित करे जो रेड्डी के ख़िलाफ़ होने वाले प्रचार का काउंटर पेश करे और साथ में रेड्डी की शख्सियत और काम-काज को भी जनता के बीच चमकाए। इसके लिए उन्होंने आंध्र के बीसेक शहरों में औने-पौने दाम पर जगन को ज़मीन मुहैया करायानए-नवेले अख़बार को स्थापित अख़बारों के मुकाबले ज्यादा कीमत पर विज्ञापन दिया और जिस भी तरह से संभव हुआ साक्षी के पोषण में जगन का हर कदम पर साथ दिया। अगर 2 सितंबर 2009 को वाईएसआर की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत नहीं हुई होती तो साक्षी कहीं ज़्यादा बड़ा समूह होता और जगन कहीं ज़्यादा शक्तिशाली।
23 मार्च 2008 को साक्षी अख़बार की पहली प्रति छपी और पहली बार 1 मार्च 2009 को साक्षी टीवी का प्रसारण हुआ। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रिंट मीडिया के वास्ते 2008-2011 के लिए राज्य सरकार के कुल 200 करोड़ रुपए के विज्ञपान बजट में से 101.63 करोड़ रुपए साक्षी के झोले में आया। यानी आधे से ज़्यादा। इसी तरह उक्त अवधि के लिए कुल 40 करोड़ रुपए के टीवी बजट में से साक्षी टीवी को 17 करोड़ रुपए हासिल हुए। सूचना और जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी किए विज्ञापनों के अतिरिक्त साक्षी अख़बार और टीवी को राज्य के अलग-अलग एजेंसियों द्वारा भी विज्ञापन मिले। मिसाल के तौर पर एपीएसआरटीसीएपी ट्रांसकोएपी जेंकोसिंगरैनी कोलियरीज आदि। इन एजेंसियों से मिला विज्ञापन 300 करोड़ रुपए से भी ज़्यादा का था। विज्ञापन के इस वितरण पर इनाडु और आंध्र ज्योति ने तीखे सवाल उठाए और राज्य भर में यह प्रचार किया कि राजशेखर रेड्डी ने परिवारिक उद्योग खड़ा करने के लिए सरकारी ओहदे का बेजा इस्तेमाल किया है।

साक्षी पर सीबीआई की छापेमारी और विज्ञापन बंद करने के सरकारी फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन
करते पत्रकार और वाईएसआर कांग्रेस कार्यकर्ता
दैनिक संबंद बनाम त्रिपुरा राज्य के फैसले में अदालत का मानना था कि एक ही श्रेणी के अलग-अलग अख़बारों को अगर राज्य सरकार विज्ञापन देने में भेद-भाव बरतती है तो एक तरह से सरकार के इस कदम को संविधान की धारा 14 और 19 का उल्लंघन माना जाएगा। इस लिहाज से देखें तो वाईएसआर ने साक्षी को जमाने में मीडिया में एक धड़े को दबा दिया और अदालत ने अभिव्यक्ति की आज़ादी (मीडिया के संबंध में) की जो व्याख्या पेश कीउससे दूर खड़े होकर उन्होंने जगन का साथ दिया। वाईएसआर ने न सिर्फ़ साक्षी की मदद की बल्कि अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी इनाडु पर लगाम कसना भी चालू किया और यही वह दौर है जब ब्लैकस्टोन ने इनाडु से अपना शेयर वापस खींचा था।
लेकिन कार्रवाई के तौर पर राज्य सरकार द्वारा इस समय साक्षी के विज्ञापन निरस्त किए जाने को बदले की भावना के तौर पर देखा जा रहा है। इसके दो पहलू हैं। पहलाबीते साल-दो साल से साक्षी ने कांग्रेस पर इनाडु और आंध्र ज्योति से भी ज़्यादा तीखे सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। जगन की कांग्रेस हाईकमान से इस बात को लेकर नाराजगी थी कि मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें क्यों नहीं चुना जा रहा। कांग्रेस द्वारा दरकिनार किए जाने के बाद जगन ने वाईएसआर कांग्रेस नाम की नई पार्टी बना ली और कांग्रेस पार्टी पर हमला जारी रखा। इस वजह से सरकार की नज़र में साक्षी चुभ रहा था। दूसराअगर साक्षी को ज़्यादा विज्ञापन देना अदालती फैसले के मुताबिक इनाडु और आंध्र ज्योति के साथ नाइंसाफ़ी है तो साक्षी का विज्ञापन बंद किया जाना भी उसी फैसले के मुताबिक साक्षी के साथ नाइंसाफ़ी है।
ऐसा नहीं है कि इनाडु का रिकॉर्ड बहुत पाक-साफ़ है। लेकिन आंध्र के भीतर और बाहर साक्षी को लेकर पत्रकार बिरादरी में एक उफ की भावना शुरू से थीलोगों ने देखा कि किस तरह साक्षी का साम्राज्य खड़ा हुआ है। इसलिए साक्षी के विज्ञापन बंद किए जाने के मसले पर साक्षी समूह के नौकरीपेशा पत्रकारों के अलावा गिने-चुने पत्रकार ही उसके पक्ष में उतरेजबकि जिस समय आरबीआई एक्ट के तहत इनाडु की सिस्टर कंपनी मार्गदर्शी फाइनेंसियर्स एंड मार्गदर्शी चिट फंड जांच के दायरे में आई थी तो एन राम और कुलदीप नैयर जैसे संपादकों ने इसे मीडिया पर हमला करार देते हुए पूरे घटनाक्रम की पुरजोर निंदा की थी और अपने-अपने अख़बारों के बाहर एडिटर्स गिल्ड तक में अभियान चलाया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि आरबीआई एक्ट के तहत इनाडु अख़बार या किसी भी तरह मीडिया पर सीधे-सीधे हाथ नहीं रखा गया था। चिट फंड कंपनी की जांच हो रही थीलेकिन संपादकों ने इसे मीडिया पर हमला करार दिया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फ़ैसला सुनाया कि रामोजी राव के बैंक खातों को सील किया जाना उचित नहीं है। साक्षी के खातों को जब सील किया गया तो इसके सामने मार्गदर्शी की नजीर थी। इसलिए उसे उम्मीद थी कि खातों पर लगी पाबंदी हट जाएगी। हांसाक्षी के बचाव में बड़ी संख्या में पत्रकार सामने नहीं आए। आंध्र में जो-कुछ प्रदर्शन हुआ वो सिर्फ साक्षी में ही छप कर रह गया। हालांकि हैदराबाद उच्च न्यायालय ने जगति प्रकाशनइंदिरा टीवी और जननी इंफ्रा के खातों पर लगे प्रतिबंध को वापस लेने का फैसला सुनाया। साक्षी को राहत तो मिलीलेकिन जनसमर्थन नहीं मिला। साक्षी का अतीत ही साक्षी की बेचारगी का प्रमुख कारण है। जगनमोहन ने खुले तौर पर अपने अख़बार को मुखपत्र’ में तब्दील कर दिया और अख़बार के भीतर राजनीतिक विचारधारा के स्तर पर जो न्यूनतम विविधता होनी चाहिए उसे लगभग ख़त्म कर दिया।
साक्षी जब आंध्र के 23 शहरों में उतरा तो वाईएसआर उसके सबसे बड़े हीरो थे। अख़बार की नज़र में सुपरमैन। इसी तरह चंद्र बाबू नायडू राज्य के वास्ते सबसे ग़लत इंसान। इसके ठीक उलट इनाडु की नज़र में चंद्रबाबू नायडू राज्य के तारणहार थे तो वाईएसआर प्रगति में अवरोधक। जाहिर है सबका अपना-अपना मीडिया था और अपनी-अपनी ख़बर। 2009 के आम चुनाव में साक्षी टीवी ने एनटी रामाराव की एक वीडियो फुटेज को बार-बार दिखाया जिसमें वो अपने दामाद चंद्र बाबू नायडू की आलोचना कर रहे थे। साक्षी अख़बार और टीवी ने पूरे चुनाव के दौरान वाईएसआर के मुखपत्र के तौर पर काम किया और इसी वजह से साक्षी को चुनाव आयोग की तरफ़ से नोटिस भी भेजा गयाजिसमें कांग्रेस और वाईएसआर की कुछ कवरेज को पेड न्यूज़ की श्रेणी में रखते हुए साक्षी से सवाल किया था। विरोधी पार्टियों ने चुनाव आयोग से इस बाबत कार्रवाई करने की अपील की थी। टीडीपी ने प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष को चिट्ठी भी लिखी कि साक्षी का रवैया नायडू और उनकी पार्टी को लेकर भेदभाव का रहता है और इस तरह मीडिया में मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने में हो रहा है।
लेकिन शिकायत सिर्फ़ एक पक्ष से नहीं हो रही थी। जगन मोहन की पार्टी ने भी चुनाव आयोग से शिकायत की कि आंध्र प्रदेश में इनाडुटीवी9एबीएन (आंध्र ज्योति का टीवी चैनल) और स्टूडियो एन (चंद्रबाबू नायडू के परिवार द्वारा संचालित) पेड न्यूज़ में मशगूल हैं। जगन ने आरोप लगाया कि ये सभी मीडिया समूह सिर्फ़ टीडीपी उम्मीदवारों के जुलूस को ही प्रमुखता से उभार रहे हैंइसलिए जो ख़बरें छपती हैं या प्रसारित होती हैं उनके ख़र्चे को टीडीपी उम्मीदवारों की खर्च सूची में जोड़ा जाना चाहिए। इस तरह जगन और रामोजी राव (इनाडु के मालिक) के बीच का हिसाब बराबर हो गया। आंध्र प्रदेश में पेड न्यूज़ की चर्चा बीते 5 साल से बेहद गरम है। कई रूपों में और कई शहरों में। आंध्र के कुछ मीडिया समीक्षकों का ये मानना है कि संयोगजगन का भाग्य या फिर पूर्व निर्धारित योजना में से जो भी हो लेकिन पिछले चुनाव में अख़बारों और टीवी चैनलों पर पंखे के विज्ञापन में बेतहाशा वृद्धि देखी गई। ओरिएंटखेतान जैसी नामी कंपनियों अलावा कई गुमनाम और लोकल टाइप की पंखा कंपनियों के विज्ञापन से साक्षी सहित वो सारे अख़बार पटे हुए थेजिनपर जगन का आरोप होता है कि वो उनके ख़िलाफ़ खड़े हैं। इस तरह गर्मी में चुनाव होने से जगनमोहन रेड्डी का चुनाव चिह्न पंखा लोगों की नज़रों में हर अख़बार और टीवी के जरिए छाया रहा। कडप्पा में पंखे ही पंखे दिख रहे थे। सड़क परहोर्डिंग्स मेंपर्चों मेंजगन के विज्ञापन में और पंखा कंपनियों की विज्ञापन में। क्या साक्षीक्या इनाडु पंखा के मामले में सब एक थे।

सुनिए : हम देखेंगे/इकबाल बानो

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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